इन दिनों ये बातें आम हैं कि लोग किताबें नहीं पढ़ते और दूसरी ओर यही शिका’यत है पाठकों की कि आजकल किताबें अच्छी नहीं आ रही हैं। तो ऐसे में ये कहना ग़ल’त नहीं होगा कि जो किताबें पाठक चाहते हैं वो लेखक लिख नहीं रहे हैं या जो किताबें लेखक लिख रहे हैं उसे पढ़ने के लिए पा’ठक अभी तै’यार ही नहीं हैं।

इन सारी बातों को विरा’म लगाती हुई एक कि’ताब ऐसी आयी जिसके बारे में ये कहा जा सकता है कि वो लेखक और पाठक के बीच एक पुल बन गयी है। तभी तो एक ही महीने में इस किताब की 2500 कॉपीज़ बिक गयीं। ये किताब है सेल्फ़ हेल्प और मैंनेजमेंट की किताबें लिखने वाले जतिन गुप्ता की पहली का’ल्पनिक किताब “क’लियुग(Kali yuga: The Ascension)”

इस किताब की ख़ा’सियत है कि ये न तो आपको पूरी तरह पौ’राणिक गाथाओं में लेकर जाती है और न ही आपको पूरी तरह का’ल्पनिकता में डूबोती है। इस किताब की कहानी में पु’राणों का रस है तो साथ ही कल्पना का ऐसा मिश्रण है जो आपको एक अलग ही लोक में ले जाता है। जतिन गुप्ता का लेखन इतना स’हज है कि आपको कुछ ही पलों बाद लगता है जैसे आप इस जगह को अच्छी तरह से पहचानते हैं।

इस किताब में क’लियुग की कहानी है जहाँ परशुराम एक गुरु के रूप में किस तरह मा’र्गदर्शन करते हैं। इस किताब की सबसे अच्छी बात यही है कि ये एक नया विचार रखती है लेकिन आपके विचारों को बदलने के लिए किसी तरह का कोई द’बाव न डालते हुए भी आपको कुछ दे जाती है। शायद यही कार’ण है कि इसे ज़्यादा से ज़्यादा लोग पढ़ना चाह रहे हैं और हाथों- हाथ ले रहे हैं।

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