महाराष्ट्र की उथल पुथल में अब भाजपा ने अपने सदस्यों को होटल में रखा, एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना में..

November 19, 2019 by No Comments

मुंबई: जिस तरह से महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों की घोषणा के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में उथल-पुथल चल रही थी, उससे यह संकेत मिले थे, कि महाराष्ट्र के मेयर के पद का चुनाव भी बहुत मुश्किलों भरा होने वाला है। लेकिन, अब ख़बर आ रही है कि बीजेपी मुंबई के मेयर पद के लिए अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी, तो अब यह साफ़ हो गया है, कि मुंबई महानगर पालिका के मेयर का पद हासिल करने में शिवसेना के सामने कोई रुकावट नहीं है। और इसी के साथ शिवसेना का मेयर पद हासिल करना लगभग तय हो चुका है।

2017 के बीएमसी चुनाव के समय भाजपा और शिवसेना अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे। और चुनाव में शिवसेना ने 84 और बीजेपी ने 82 सीटों पर जीत हासिल की थी। जिसके बाद शिवसेना ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के 7 सदस्यों और तीन निर्दलीय सदस्यों को अपनी पार्टी में शामिल करके अपनी संख्या 94 तक बढ़ा ली थी। शिवसेना और बीजेपी में चली खींचतान के बाद अंततः बीजेपी ने शिवसेना के विश्वनाथ महादेश्वर को महापौर बनाने के लिए अपना समर्थन दे दिया था।

बता दें कि शिवसेना के महापौर पद के लिए उम्मीदवार प्रभादेवी से चार बार पार्षद रहीं किशोरी पेडणेकर ने 22 नवंबर को होने वाले महापौर पद के चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया है। जबकि उप महापौर पद के लिए पार्षद मलाड सुहास वडकर ने नामांकन दाखिल किया है। इससे पहले बीजेपी विधायक आशीष शेलार ने कहा कि बीजेपी मुंबई महापौर के पद के लिए अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के पास संख्या बल नहीं है। और विपक्षी दलों के साथ शामिल होकर पार्टी अपनी विचारधारा के साथ कोई समझौता नहीं करेगी।

मेयर के चुनाव में भी एनसीपी और कांग्रेस की नज़दीकी शिवसेना से दिखी है. इसका असर बीएमसी के साथ ही ठाणे महानगरपालिका में भी देखने मिला जहां पर भी एनसीपी ने महापौर चुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारा और शिवसेना के नरेश म्हस्के बिना किसी विरोध के महापौर चुन लिए गए.शिवसेना और बीजेपी के बीच बढ़ते तनाव का असर महानगरपालिका के चुनावों में साफ नजर आ रहा है. नासिक महानगरपालिका में अपने पार्षदों के शिवसेना से संपर्क में होने के डर से बीजेपी ने सभी पार्षदों को नासिक से करीब 600 किलोमीटर दूर सिंधुदुर्ग में एक होटल में रखा है. शायद यह पहली बार है जब बीजेपी को अपने नेताओं के दूसरे पार्टी में शामिल होने का डर सता रहा है.